जब पहली बार English से आमना-सामना हुआ

जब पहली बार English से आमना-सामना हुआ

जैसे ही मैंने बताया कि आवर्त सारणी में इन धातुओं को “क्षारीय मृदा धातु” कहा जाता है पूरी क्लास ठहाका मार कर हंस दी। मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि क्लास में जो U.P. Board के बाकी लोग बैठे हैं ये कहाँ से पढ़े हैं कि इनको सब समझ में आ रहा है। वो तो क्लास के बाद जो हुआ उससे उनकी सच्चाई समझ में आई।

पृष्ठभूमि 

वाक्या यह था कि जब मैंने 12वीं की पढाई पूरी कर ली तो पापा जी ने कहा कि अब M.N.R. (उस समय Engineering में Entrance के लिए यह test होता था) की तैयारी कर लो तो किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा और इंजीनियर बन जाओगे।

यह बात मैंने योगेश को बताई तो योगेश ने कहा कि मैं तैयारी को एक साल नहीं दे सकता मुझे तो इसी साल एडमिशन लेना है। योगेश ने कोचिंग करने से मना कर दिया तो मेरा मन आधा रह गया उस समय योगेश के बिना पढने की सोच भी नहीं सकता था। पर मुझे तो तैयारी करनी ही थी सो योगेश को साथ लेकर आगरा की एक नामी कोचिंग में बात करने चला गया।

कोचिंग का नाम नहीं लूँगा, बस इतना समझिये कि कोचिंग हरीपर्वत चौराहे पर स्थित है। कोचिंग के संस्थापक से बात की तो उन्होंने बताया कि एक महीने बाद MNR का पेपर है तो आप चाहो तो इस बार भी entrance test दे सकते हो। मुझे बात जंच गयी मैंने उसके लिए एडमिशन ले लिया। उस समय फीस यही कुछ 6000 – 7000 के लगभग थी।

कोचिंग में पहला दिन

अगले दिन से नियत समय पर कोचिंग जाने लगा, बचपन से लेकर 12वीं तक एक ही स्कूल में पढ़ा था (9वीं को छोड़ कर) सभी जान पहचान के लोगों के साथ पढता था। यह पहला मौका था जब सभी अनजान थे और मैं अनजान लोगों के बीच अकेला पढने आया था (बिना किसी दोस्त के)।

मुझे लग रहा था कि हमको रोज तीन बिषय पढाए जायेंगे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित पर मैं गलत था हमको पढ़ाया जाना था Physics, Chemistry और Mathematics.

मैं पहले दिन क्लास में पहुँच कर एक कुर्सी पकड़ कर बैठ गया। क्लास में कुछ लड़के ऐसे थे जो मेरी तरह ही शांत बैठे हुए थे और अकेले लग रहे थे। उनके बैठने के तरीके से मैं बता सकता था कि यह लोग भी मेरी तरह UP Board के पढ़े हुए हैं। कुछ लोग ग्रुप में बैठे थे उनमें हंसी-ठिठोली चल रही थी, चेहरों पर आत्मविश्वास झलक रहा था और हर ग्रुप में कम से कम एक लडकी जरूर थी।

पहली क्लास

पहली क्लास Physics की थी, सर आये और परिचय की जगह अपना introduction दिया, उनके introduction से इतना समझ में आ गया कि 20 साल के दिखने बाले यह सर पढ़ाने में लगभग 50 साल का अनुभव रखते हैं और इनसे अच्छा आगरा में तो कोई भी नहीं पढाता।

उसके बाद उन्होंने physics पढ़ानी शुरू की, मैंने अपना 10 रु. वाला रजिस्टर खोल लिया और लिखने लगा, असल में लिखने की कोशिश करने लगा, क्यूंकि लिखूं तो तब जब उनका बोला हुआ मुझे समझ में आये।

उनके बोले हुए English के शब्द मेरे कानों तक आते, कान के परदे से भी टकराते, नसों से होते हुए दिमाग में भी जाते, पर दिमाग अधिकतम शब्दों को कचरा पेटी में फेंके जा रहा था। कभी कभी कुछ शब्द जैसे is, am, are, here, there, up, down इनको दिमाग बड़े सम्मान के साथ बिठा रहा था पर इसके साथ जो दुसरे शब्द जुड़े थे उनके साथ मेरे दिमाग का व्यवहार दोस्ताना नहीं था।

मैं समझ गया गलत जगह फंस गया हूँ इस तरह से पढाई करना मेरे बस में नहीं है। फिर मैंने रजिस्टर बंद कर दिया, सिर्फ सुनने की कोशिश करने लगा 20-25 मिनट कोशिश करने पर कुछ और नए शब्दों के साथ दिमाग ने दोस्ती कर ली पर फिर भी जो बोला जा रहा है उसको समझना तो बहुत दूर की बात थी।

तभी सर की जुबान के साथ उनकी उंगलियाँ भी हरकत में आईं और इतनी देर से खाली पड़े whiteboard (मैंने पहली बार देखा था) पर कुछ आड़ी तिरछी लाइन खिंच गयीं। अरे! यह तो भौतिक विज्ञान है, अपनी वाली भौतिक विज्ञान जिसे कामेंद्र सर से सीखा था, दिमाग मानो नाच गया। जैसे-जैसे सर के हाथ एक चित्र बनाते जा रहे थे वैसे-वैसे दिमाग अपने घर की अलमारियों में उस चित्र को तेजी से खोज रहा था। उधर चित्र का बनना ख़त्म हुआ इधर मेरे दिमाग की खोज और… अरे वाह! यह तो मेरा पसंदीदा टॉपिक ही पढ़ा रहे हैं, “अपवर्तन और परावर्तन”।

अब उन्होंने चित्र को समझाना शुरू किया और मेरे दिमाग ने उनके शब्दों की मेहमाननबाजी। अब इक्का-दुक्का शब्दों को ही बैठने की जगह नहीं मिल रही थी, पर उनकी वजह से समझ में कुछ नहीं आ रहा था। दिमाग ने मेरे हाथ को इशारा किया, हाथ हरकत में आया और जैसे एम्पायर आउट का इशारा देने के लिए हाथ खडा करता है मैंने क्लास में अपना हाथ खड़ा कर दिया।

“यस”, सर ने कहा।

“सर English में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, हिन्दी में पढ़ाइये” – जैसे ही मैंने यह कहा पूरी क्लास मेरी तरफ ऐसे देखने लगी जैसे मैं दुसरे ग्रह से आया हूँ।

“यहाँ पर अधिकतर लोग English medium से हैं तो पूरा तो हिन्दी में नहीं पढ़ा सकता, पर आपको जब समझ ना आये आप पूछ लेना मैं हिन्दी में समझा दूंगा” – सर ने कहा।

“क्या-क्या पूछूं यहाँ तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है” – मेरे दिमाग ने कहा। मैं उसको थोड़ी देर शांत रहने के लिए कह कर बैठ गया।

कमाल की बात थी, “अपवर्तन और परावर्तन” में ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे ना आता हो। यह चित्र किस बारे में था वह मेरा दिमाग खोज लाया था, अब मैं पूरी क्लास को समझा सकता था कि यह चित्र क्या कहना चाहता है। इसके वावजूद जो सर पढ़ा रहे थे वह समझ में नहीं आ रहा था। मैं विश्लेषण करने में लगा था कि किस वजह से समझ में नहीं आ रहा है, और इस नतीजे पर पहुंचा कि जिन शब्दों के मतलब समझ में नहीं आ रहे उनकी वजह से ही समझ में नहीं आ रहा है।

मैंने उन शब्दों को पकड़ने की कोशिश की पर फायदा नहीं हुआ, तभी सर ने चित्र में लिखा Refractive Index, मैंने बहुत देर से गच्चा देने वाले इस शब्द को पहचान लिया। फिर से हाथ खडा किया और..

“यस”, सर ने कहा।

“सर, ये जो शब्द आपने लिखा है “Refractive Index” इसको हिन्दी में क्या कहते हैं?” – मैंने बड़ी नम्रता के साथ कहा।

“मुझे नहीं पता, इसको तो refractive index ही कहते हैं, आपने यह 12th में नहीं पढ़ा?” – सर ने चुटकी लेते हुए कहा तो पूरी क्लास हंस गयी।

मैंने कहा – “यह चित्र पढ़ा है और इसको पूरा बता भी सकता हूँ पर यह जो शब्द है इसका हिन्दी में मतलब पता चल जाए तो आपकी पूरी बात समझ में आ जायेगी।”

“U.P. Board से अकेले आप नहीं हैं, क्लास में और भी लोग U.P. Board से पढ़ कर आये हैं, उनको तो सब समझ में आ रहा है। अकेले आप के लिए मैं अपने पढ़ाने के तरीके को बदल नहीं सकता। बैठ जाइए।” – मैंने भी चारों तरफ देखा, U.P. Board वाले शान्ति से बैठे थे, हल्की सी मुस्कान के साथ जैसे सब समझ में आ रहा है। मैं भी शान्ति से बैठ गया, उस दिन योगेश की कमी बहुत खली। क्लास ख़त्म हो गयी, कुछ समझ में नहीं आया।

दूसरी क्लास

पहली क्लास ख़त्म होते ही दूसरी क्लास शुरू हो गयी, काश यह क्लास “रसायन विज्ञान” की होती, पर मेरे चाहने से क्या होता है, अगली क्लास थी “Chemistry” की।

मेरा दिमाग शब्दों के साथ टेस्ट मैच खेलने के लिए तैयार था, अधिकतर शब्दों को खाली छोड़ देना है, जो छोटे-मोटे शब्द अपने बैट पर आते हैं उन पर एक-दो रन लेकर अपने मन को बहलाते रहना है कि हमें खेलना आता है।

सर ने भी क्लास में आकर बोलना शुरू किया, Physics की क्लास में कम से कम उस चित्र को देख कर मेरे समझ में आ गया था कि किस टॉपिक को पढ़ाया जा रहा है, पर Chemistry में कैसे समझ में आएगा? वो बोले जा रहे थे, whiteboard पर अभी भी physics का वह चित्र बना था। whiteboard के पास में एक Periodic table का बडा सा पोस्टर लगा हुआ था, सर बार-बार दूर से ही उसकी तरफ इशारा करते और फिर कुछ समझाने लग जाते।

थोड़ी देर झेलने के बाद मैंने हाथ उठाया।

“यस” – सर बोले।

इस बार पूरी क्लास को पता था कि मैं क्या कहने वाला हूँ। आपको भी समझ में आ ही गया होगा। “सर हिन्दी में समझाइये”।

“पूरा समझाना संभव नहीं है, जो समझ नहीं आये वो पूछ लेना” – सर बोले।

पर इस बार में आर-पार के मूड में था, मैंने कहा सर इतना तो मुझे समझ में आ रहा है कि आप किसी रासायनिक तत्व के बारे में बोल रहे हैं। अगर मुझे इतना भी पता चल जाए कि आप किस तत्व के बारे में बात कर रहे हैं तो मैं कम से कम घर पर उसको पढ़ सकता हूँ। इसलिए जब आप किसी नए रासायनिक तत्व के बारे में बताएं तो उसका नाम बोर्ड पर लिख दीजिये, मेरे लिए काफी होगा।

इस बात के लिए सर मान गए, मैं बैठ गया और उन्होंने बोर्ड पर लिखा “Alkaline Earth Metals”, मैंने फिर हाथ उठाया।

“यस” – सर बोले।

“सर इसको हिन्दी में क्या कहते हैं, वो और बता दीजिये” – मैंने कहा।

रावण के दस सर, मेघनाद और कुम्भकर्ण मिलकर भी इतनी तेज नहीं हंस सकते जितनी तेज पूरी क्लास हंस दी।

पर जब मैं आर-पार की ठान ही चुका था तो उनकी मेरे सामने चलने वाली नहीं थी। मैं खड़ा रहा और अपने सवाल के उत्तर का इंतज़ार करता रहा। थोड़ी देर बाद माहौल सामान्य हुआ तो सर ने कहा कि मैं हिन्दी में इसका अर्थ नहीं जानता, क्लास में कोई जानता हो तो बताये। सब शांत रहे।

CBSE बोर्ड बालों से उम्मीद थी ही नहीं पर U.P. Board वाले भी जब शांत रहे तो मैं समझ गया कि इनको भी समझ नहीं आ रहा है, पर इंजीनियरिंग में दाखिला होने से ज्यादा चिंता उनको अपनी नाक की है इसलिए सवाल नहीं पूछते।

फिर मैंने सर से कहा कि आप आवर्त सारणी की तरफ इशारा करके मुझे बात दें तो मैं तुरंत समझ जाऊंगा। सर ने मेरी तरफ देखा बोले “किसकी तरफ इशारा करना है?”

“आवर्त सारणी की तरफ” – मैंने कहा। क्लास में शान्ति फ़ैल गयी, तूफ़ान के आने से पहले की शान्ति।

“ये क्या है?” – सर ने कहा।

“ये जो whiteboard के साथ में टंगी है” – मैंने कहा।

“ओह्ह, periodic table” – सर ने कहा और तूफ़ान आ गया, शान्ति भंग हो गयी, ठहाका गूँज गया। “आवर्त सारणी” शब्द ने क्लास में मौजूद सभी लोगों का, Rowan Atkinson के किसी भी एक्ट से ज्यादा मनोरंजन किया।

जब दुबारा शांति स्थापित हुई तो सर मेरी “आवर्त सारणी” और अपनी “Periodic Table” के पास गए और इशारा करते हुए कहा यह है “Alkaline Earth Metals” इसके बारे में समझा रहा हूँ।

“अच्छा, अच्छा। इनको हिन्दी में “क्षारीय मृदा धातुएं” कहते हैं। – मैंने कहा।

ठहाके के उम्मीद थी पर ठहाका नहीं आया, दबी-दबी मुस्कान आई और सबके चेहरे एक बार फिर मेरी तरफ मुड़ गए। इस बार व्यंगात्मक लहजा नहीं था, प्रश्नावाचक था। सबके होंठ बंद थे, आँखें बोल रही थीं कि जोक समझ में नहीं आया, दुबारा समझाओ।

मैं भी समझ गया कि मुझे तो थोड़ी बहुत English फिर भी आती है पर इन बेचारों को कठिन हिन्दी नहीं आती सो मैं भी अपनी सीट से निकल गया, marker उठाया और whiteboard पर बड़ा-बड़ा लिख दिया “क्षारीय मृदा धातुएं”। अंततः सभी की आँखें प्रश्नावाचक से व्यंग्यात्मक मुद्रा में पहुँचीं, चेहरे के भाव बदले, आँखें बंद हुईं, मुंह खुले और फिर से रावण की हंसी को मात देती हुई हंसी क्लास में गूंजीं।

मैं जाकर अपनी सीट पर बैठ गया कि अब पढाओ, मुख्य शब्द तो मुझे पता ही है अब सिर्फ छोटे मोटे शब्द बचे हैं उन्हें में देख लूँगा और घर पर जाकर बाकी सब समझ भी लूँगा। फिर भी बहुत कुछ समझ में नहीं आया।

क्लास के बाद

क्लास ख़त्म हुई, पता चला कि उस दिन Mathematics की क्लास नहीं होनी है तो कोचिंग से निकला और साइकिल की तरफ बढ़ने लगा। तभी पीछे से आवाज आई।

“ओए, रुक” – मुड़ कर देखा दो-तीन लड़के मेरी तरफ आ रहे थे। चेहरा देख कर पहचान गया, क्लास में ही बैठे हुए थे। मैं रुक गया।

पास आये, तो चेहरा देख कर समझ में आ गया, बहुत गुस्से में लग रहे थे। “तूने क्लास में हमारा मजाक उडा दिया” – एक ने कहा।

“पहले तो मैं तुमको जानता ही नहीं, किसी से क्लास में बात तक नहीं हुई, और तुम कह रहे हो कि मैंने तुम्हारा मजाक बना दिया, कैसे?” – मैंने गुस्सा-मिश्रित आश्चर्य से पूछा।

“तूने क्लास में U.P. Board के सभी students का मजाक बना दिया। अब सभी CBSE के लड़कों को पता चल गया कि हमको English में पढ़ाया हुआ समझ में नहीं आता है। अब वो हमारा रोज मजाक बनायेंगे।” – उन्होंने कहा।

“English नहीं आती तो मजाक बनायेंगे? उनको हिन्दी आती है क्या? तुम उनका मजाक बनाओ। किसने रोका है?” – मैंने कहा।

“मैं इस कोचिंग में पढने आया हूँ, रुपये दिए हैं, समझ में नहीं आएगा तो मैं तो सवाल पूछूंगा ही, तुमको दिक्कत है तो तुम किसी और बैच में ज्वाइन कर लो।” – मैंने दो टूक कह दिया।

“अरे तू समझता नहीं है, English नहीं आना बहुत बेइज्जती की बात होती है।” उनमें से एक ने कहा।

मैंने कहा – “तुम्हारे लिए होती होगी। मेरा तो ऐसा कोई काम नहीं है जो English ना आने की वजह से रुक गया हो। अब मुझे लेट हो रहा है वैसे भी यहाँ कुछ समझ में नहीं आया तो घर जाकर पढना पड़ेगा।” फिरअपनी साइकिल उठाई और घर का रास्ता नापा।

अंतरद्वन्द

रास्ते में यही सोचता रहा कि इन लोगों को जब समझ में नहीं आ रहा तो ये अपने रुपये क्यूँ बर्बाद कर रहे हैं? मुझे तो एक दो दिन और समझ में नहीं आया या इन्होंने हिन्दी में पढ़ाना शुरू नहीं किया तो अपने रुपये वापस मांगूंगा। दूसरी बात यह कि English नहीं आने से क्या नुकसान है?

मुझे तो उन बेचारों पर तरस आ रहा था जिनको हिन्दी नहीं आती। बेचारे सुपर कमांडो ध्रुव, नागराज, डोगा, बांकेलाल, शक्ति की कॉमिक्स तो पढ़ ही नहीं पाते होंगे और पढ़ भी लेते होंगे तो समझ में नहीं आती होगी। बचपन में भी बेचारे ना नन्हें सम्राट पढ़ पाए होंगे और ना नंदन और चम्पक, इनका तो बचपन भी बर्बाद हो गया। सबसे बड़ी बात मुंशी प्रेमचंद्र को भी नहीं पढ़ पायेंगे, बाप रे ये जियेंगे कैसे यही सोचते-सोचते रास्ता कट गया।

अंत भला तो सब भला

खैर, कोचिंग तो जैसी भी हुई हो पर MNR दिया भी और पास भी हो गया पर English नाम के राक्षस से उस दिन तो सिर्फ पहला सामना हुआ था असली युद्ध बाकी था। English ने कैसे-कैसे दिन दिखाए मेरे लेखों से आपको पता चलता रहेगा। फिलहाल तो यह बताइयेगा कि यह कहानी कैसी लगी। अगर कहानी पढ़ते हुए आपको हंसी नहीं आई तो मेरा लिखना बेकार ही रहा।

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