मन का डर और आई.आई.टी. में इंटरव्यू

उस दिन सुबह जब सो कर उठा तो मन में एक अजीब सी घबराहट थी। उन दिनों में CDAC में जॉब करता था और उस दिन रविवार था, मतलब ऑफिस जाना कोई जरूरी नहीं था। हालांकि प्रोजेक्ट के काम से जाना था, पर जाना या ना-जाना पूरी तरह से मेरे हाथ में था।

एक दिन पहले ही आई. आई. टी. बॉम्बे में Ph.D. में एडमिशन के लिए लिखित परीक्षा दी थी। परीक्षा में काफी अच्छा किया था और मुझे उम्मीद थी कि इंटरव्यू के लिए मुझे चुन लिया जाएगा जो एक खुशी की बात थी। बाकी सब कुछ एकदम नार्मल था घबराने बाली कोई बात नजर नहीं आ रही थी, पर जैसे-जैसे दिन बढ़ रहा था घबराहट भी बढ़ती जा रही थी। एक अजीब सी बेचैनी परेशान कर रही थी जिसकी वजह समझ में नहीं आ रही थी।

घबराहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी तो मैं इस उम्मीद से ऑफिस चला गया कि दोस्तों से मिल कर और प्रोजेक्ट में काम करने से ध्यान बंटेगा और बेचैनी कम होगी। ऑफिस में दोस्तों से मिला, प्रोजेक्ट पर काम किया, खाना खाया पर कोई फायदा नहीं, बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। आम तौर पर प्रोग्रामिंग करना मुझे सुकून देता है, जब प्रोग्रामिंग करता हूँ तो मेरा ध्यान सिर्फ उसी पर लग जाता है पर उस दिन प्रोग्रामिंग में भी मन नहीं लग रहा था।

घड़ी की सुइयां दो बजने का इशारा कर रही थीं। मैं प्रोजेक्ट पर फोकस करने की कोशिश कर रहा था कि अचानक याद आया कि आई.आई.टी. में इंटरव्यू होना है पर मुझे यह तो पता ही नहीं है कि कब होगा? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आज ही हो? दिन आधे से ज्यादा निकल चुका था, जैसे ही यह ख्याल दिल में आया कि अगर “आज ही इंटरव्यू होना होगा तो अब तक तो सभी लोगों के इंटरव्यू ख़त्म हो गए होंगे या मेरा नंबर निकल चुका होगा तो मेरा एडमिशन नहीं हो पायेगा” में AC में भी पसीने से भीग गया।

यूं तो मैं अपनी जॉब से खुश था, पर मेरी जॉब में मैं कम्प्युटर नेटवर्किंग के क्षेत्र में काम करता था (उस समय मैं Disaster Recovery प्रोजेक्ट में काम कर रहा था) जबकि मैं अपनी जानकारी को शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करना चाहता था। इसलिए मैं बहुत कोशिश कर रहा था कि कहीं कोई ऐसा कोर्स या जॉब हो जो कम्प्युटर साइंस की मेरी नॉलेज को शिक्षा के क्षेत्र में लगाने का मौक़ा दे। यह बात मेरे सभी दोस्त बहुत अच्छी तरह जानते थे। इसलिए जैसे ही “संकल्प बगारिया” (मेरे साथ ही प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे और मेरे अच्छे मित्र हैं) को आई.आई.टी. से ई-मेल मिला कि Educational Technology नाम से एक नया department खुला है और Ph.D. कोर्स में एडमिशन हो रहे हैं उन्होंने तुरंत मेरे पास ई-मेल कर दिया।

जैसे ही मुझे ई-मेल मिला मैंने तुरंत पूरी जानकारी ली और ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ली। घर गया, सारे डोक्यूमेंट लिए और आई.आई.टी. पहुँच गया। वहां academic section में एक बॉक्स रखा था जिस पर लिखा था “Application for Educational Technology”. मुझे बताया गया कि इस डिपार्टमेंट में एडमिशन लेने के लिए आपको एप्लीकेशन एक बॉक्स में डालनी है। पर मैं किसी भी हालत में ऐसी कोई हरकत नहीं करना चाहता था जिससे मेरा एडमिशन ना हो पाए। मैं चाहता था कि कोई जिम्मेदार कर्मचारी मेरी एप्लीकेशन को हाथ से ले और बदले में मुझे कोई रसीद भी दे इसलिए मैंने उस बॉक्स में एप्लीकेशन नहीं डाली। मैं इंतज़ार करता रहा कि कोई और पहले अपनी एप्लीकेशन डाले तभी मैं भी डालूँगा। एकेडमिक सेक्शन में बैठे-बैठे साढ़े पांच हो गए, सभी अपने-अपने घर जाने लगे तो मैंने जैसे तैसे अपना मन कडा करके उस बॉक्स में एप्लीकेशन डाली।

अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी कितनी ज्यादा इच्छा थी इस कोर्स में एडमिशन लेने की इसलिए जैसे ही एडमिशन ना हो पाने का ख्याल आया मेरा दिल बहुत तेज धड़कने लगा बेचैनी बहुत ज्यादा बढ़ गयी। पर समस्या यह थी कि मुझे पता नहीं था कि आज इंटरव्यू हो भी रहे हैं या नहीं। बिना जानकारी के आई.आई.टी. जाने का कोई फायदा नहीं होने वाला था क्योंकि इंटरव्यू कहाँ चल रहे हैं, इतने बड़े कैम्पस में यह पता करना नामुमकिन काम था।

अब तो रह-रह कर एक ही डर लग रहा था कि कहीं मेरा इंटरव्यू छूट ना जाये। मैंने अपने इस डर को शांत करने के लिए आई आई टी में फ़ोन किया पर रविवार होने की वजह से सभी छुट्टी पर थे और मेरा आई आई टी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। मेरे साथ CDAC में कार्य करने वाले ओमपाल जी आई आई टी में ही रहते थे, सो मैंने उनको संपर्क करने का प्रयत्न किया पर उनका फ़ोन व्यस्त जा रहा था और मेरा डर बढ़ता ही जा रहा था, जैसे-जैसे समय निकल रहा था मेरा मन और अधिक बैचैन होता जा रहा था।

आई. आई. टी. में संपर्क करने की मेरी सभी कोशिशें व्यर्थ जा रही थी। घड़ी की सुइयां साढ़े तीन बजा रहीं थीं, और मुझे संपर्क करने का कोई भी रास्ता नहीं मिल रहा था। अचानक मेरे दिमाग की घंटी बजी, मैंने सीधे उस विभाग में ही संपर्क करने का निर्णय लिया जिस विभाग में प्रवेश के लिए मैंने प्रवेश परीक्षा दी थी, इन्टरनेट से सम्बंधित विभाग का फ़ोन नं मिल गया, वहां संपर्क किया तो पता चला कि इंटरव्यू सुबह नौ बजे से चल रहे हैं, और मैं लिखित परीक्षा में पास भी हो गया हूँ, सबसे पहले मेरा ही इंटरव्यू होना था अतः मेरा नंबर निकल चुका है।

मैंने उनको स्थिति से अवगत कराया तथा पूछा कि क्या मुझे अब इंटरव्यू में बैठने की इजाजत मिल सकती है? उधर से उत्तर मिला “साढ़े चार बजे तक आ सकते हैं तो आ जाइए।

हाँ सुनने के बाद मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। घड़ी की सुइयां 3:40 का इशारा कर रहीं थीं, और जहाँ मैं रहता था (खारघर ) वहां से आई. आई. टी. तक पहुँचने में कम से कम डेढ़ घंटे का समय लगता है, तब तक इंटरव्यू समाप्त हो चुके होंगे और मैं यह सुनहरा अवसर गँवा दूंगा, मैंने तुरंत खारघर टैक्सी को फ़ोन मिलाया और एक टैक्सी बुक करवाई, ऑफिस से घर पहुंचा, कपडे बदले तब तक टैक्सी आ चुकी थी।

एक सरदार जी ड्राईवर थे, मैंने सरदार जी को स्थिति से अवगत कराया तथा उनको बोला कि “आधे घंटे में या तो आई आई टी पहुँचाओ नहीं तो ऊपर पर उससे पहले अब गाडी को रोकना नहीं”, सरदार जी ने और ट्रैफिक ने मेरा साथ दिया और ठीक साढ़े चार बजे मैं आई. आई. टी. में था। सरदार जी को विदा करके धड़कते दिल से मैं अन्दर पहुंचा तो पता चला कि अभी दो लोग इंटरव्यू के लिए बचे हैं उनके बाद मेरा नंबर आएगा। मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया और यथा स्थान बैठ गया।

इंटरव्यू हुआ पर इंटरव्यू में भी कुछ ऐसा हुआ जिसको जानकर आपको बहुत हंसी आयेगी पर वह किसी और लेख में बताऊंगा। अभी तो इतना जानिये कि इंटरव्यू में मैं पास हो गया और आज उस घटना के छः साल बाद मैं योगेन्द्र पाल से डॉ. योगेन्द्र पाल बन गया हूँ।

अगर उस दिन मन की बात सुनी नहीं होती तो पूरी जिन्दगी एक अफ़सोस रह जाता। ओम-शान्ति-ओम फिल्म का डायलॉग यहाँ एकदम फिट बैठता है- “कहते हैं कि अगर किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है। हमारी फिल्मों की तरह हमारी जिन्दगी में भी अंत में सब ठीक हो जाता है, और अगर ठीक ना हो तो वो The End नहीं है दोस्तों, picture अभी बाकी है।”

उस दिन मेरे साथ तो अच्छा ही हुआ पर अभी मंजिल पर नहीं पहुंचा हूँ। जब तक अच्छी शिक्षा के लिए कुछ ठोस नहीं कर देता तब तक मेरी यात्रा का The End नहीं होगा दोस्तों,आप सिर्फ देखते रहिये क्यूंकि Picture अभी बाकी है।

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